na jane kis tarah....GAZAL
ग़ज़ल
न जाने किस तरह कैसे ज़माना ढूँढ लेता है।
मेरी नाकाम उलफत का फसाना ढूँढ लेता है।।
बहुत खुद्दार है अक्सर बीरहा करता है रोज़े से,
गरीबी को छुपाने का बहाना ढूँढ लेता है।
जिसे आदत है सब को दर गुज़र करने की ऎ लोगों,
वो अक्सर दुश्मनों में दोस्ताना ढूँढ लेता है।
वो जिस के दिल में ज़बते गम की क़नदी लै फरोज़ॉ है,
वो अक्सर मुस्कराने का बहाना ढूँढ लेता है।
उसे शायद मज़ा आता है मुझसे रुठ जाने में,
वो अक्सर रुठ जाने का बहाना ढूँढ लेता है।
मुझे बेगाने भी अपना समझते है कहाँ जाऊँ,
मेरा किरदार खुद अपना ठिकाना ढूँढ लेता है।
बहुत अफसोस है , हमारी क़ोम का बच्चा,
किताबों की जगह वो कारखाना ढूँढ लेता है।
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