kya....

क्या लिखूं क्या ना लिखूं, आरज़ू मदहोश है
आँसू गिरते हैं पन्नो पर, और कलम खामोश है,

कही सर्दी कही गर्मी, ये कुदरत के नज़ारें हैं,
प्यास उनको भी लगती होगी, जो दरिया के किनारे हैं,

हर कोई मेरा हो जाए, ऐसी मेरी तक़दीर नही,
मैं वो शीशा हूँ, जिसमे कोई तस्वीर नही,

दर्द से रिश्ता ह मेरा, खुशियाँ मुझे नसीब नही,
मुझे भी कोई याद करे, क्या मैं इतना भी खुशनसीब नही.

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