.....न हो!!!

मुश्किलें हों लाख, नमदीदा न हो।
ज़िन्दगी ही क्या, जो पेचीदा न हो।

जो न मुस्काते रहें,वो लब नहीं,
ज़ख़्म वो कैसा,जो पोशीदा न हो।

ख़ुश न हो इतना ,बहारें देखकर,
गर ख़िज़ाँ आये तो रंजीदा न हो।

जुर्म करने के लिए जब भी उठे,
हाथ वो कैसा जो लरज़ीदा न हो।

होठ हँसने के लिए जायें तरस,
इस क़दर भी कोई संजीदा न हो।
                                  

Post A Comment
  • Blogger Comment using Blogger
  • Facebook Comment using Facebook
  • Disqus Comment using Disqus

No comments :